Climate exchange
हिमाचल प्रदेश में climate
change नहीं, climate
exchange का संकट
हिमाचल
प्रदेश
को
प्रायः
climate
change का
एक
निष्कलंक शिकार
मान
लिया
जाता
है—पिघलते हिमनद, घटती
हिमपात
और
बढ़ते
भूस्खलन इसकी
पहचान
बनते
जा
रहे
हैं।
किंतु
यह
दृष्टि
अधूरी
है।
वास्तव
में
हिमाचल
आज
climate
change
से
अधिक
climate
exchange
के
संकट
से
जूझ
रहा
है—जहाँ विकास, पर्यटन
और
मैदानी
क्षेत्रों की
आवश्यकताओं की
कीमत
पहाड़ों और
स्थानीय समुदायों को
चुकानी
पड़
रही
है।
हिमाचल
की
पर्वत
श्रृंखलाएँ उत्तर
भारत
की
जलवायु
को
संतुलित करती
हैं।
यहाँ
के
वन
कार्बन
को
संचित
करते
हैं,
हिमनद
नदियों
को
जीवन
देते
हैं
और
पहाड़
मानसूनी वर्षा
को
अवशोषित करते
हैं।
इसके
बदले
राज्य
को
जलविद्युत परियोजनाएँ, सड़कें
और
पर्यटन
से
जुड़ा
आर्थिक
लाभ
मिलता
है।
लेकिन
यह
exchange समान
नहीं
है।
बाँधों
से
उत्पन्न बिजली
दूरस्थ
शहरों
को
रोशन
करती
है,
जबकि
स्थानीय लोगों
को
नदी
तंत्र
के
विघटन
और
भूस्खलन के
बढ़ते
खतरे
का
सामना
करना
पड़ता
है।
हाल
के
वर्षों
में
हिमाचल
प्रदेश
में
असमय
वर्षा,
बादल
फटने
की
घटनाएँ
और
घटती
बर्फ़बारी—इन
सबको
प्रायः
climate change का
परिणाम
माना
जाता
है।
परंतु
स्थानीय स्तर
पर
अनियंत्रित विकास
इन
प्रभावों को
और
तीव्र
बना
देता
है।
पहाड़ों की
अंधाधुंध कटाई,
नदी
तटों
पर
निर्माण और
वनों
की
क्षति
प्राकृतिक सुरक्षा कवच
को
कमजोर
कर
रही
है।
अल्पकालिक आर्थिक
लाभ
के
बदले
दीर्घकालिक पर्यावरणीय अस्थिरता का
यह
सौदा
ही
climate
exchange
की
वास्तविक तस्वीर
है।
2023 के मानसून
के
दौरान
आई
आपदाओं
ने
इस
असमान
exchange को
स्पष्ट
रूप
से
उजागर
कर
दिया।
बाढ़
और
भूस्खलनों ने
घर,
खेत
और
आजीविका को
नष्ट
कर
दिया।
राहत
पैकेज
अवश्य
घोषित
हुए,
लेकिन
उन्होंने उस
विकास
मॉडल
पर
प्रश्न
नहीं
उठाया
जो
बार-बार जोखिम को
जन्म
देता
है।
पुनर्निर्माण की
सामाजिक, आर्थिक
और
पर्यावरणीय लागत
अंततः
स्थानीय समुदायों को
ही
वहन
करनी
पड़ी।
पर्यटन
भी
इस
climate exchange का
एक
महत्वपूर्ण पक्ष
है।
बढ़ते
तापमान
से
राहत
पाने
के
लिए
लाखों
पर्यटक
हिमाचल
का
रुख
करते
हैं।
इससे
जल
संसाधनों पर
दबाव
बढ़ता
है,
कचरा
प्रबंधन एक
गंभीर
चुनौती
बनता
है
और
पहाड़ी
कस्बों
की
वहन
क्षमता
टूटने
लगती
है।
पर्यटकों की
सुविधा
स्थानीय निवासियों की
असुरक्षा के
बदले
सुनिश्चित की
जाती
है।
यदि
हिमाचल
की
स्थिति
को
climate
exchange
के
दृष्टिकोण से
देखा
जाए,
तो
नीतिगत
सोच
में
परिवर्तन अनिवार्य हो
जाता
है।
विकास
परियोजनाओं की
वहन
क्षमता
का
आकलन,
स्थानीय समुदायों की
भागीदारी और
उन
क्षेत्रों की
जवाबदेही तय
करना
आवश्यक
है
जहाँ
लाभ
बाहर
जाते
हैं
और
जोखिम
भीतर
रह
जाते
हैं।
हिमाचल
में
climate action केवल
अनुकूलन उपायों
तक
सीमित
नहीं
रह
सकती;
उसे
न्याय
और
संतुलन
के
प्रश्न
से
भी
जुड़ना
होगा।
पहाड़ों ने
हमेशा
आवश्यकता से
अधिक
दिया
है।
climate
exchange
की
सच्चाई
को
स्वीकार करना
हिमाचल
प्रदेश
को
यह
अवसर
देता
है
कि
वह
केवल
climate change का
पीड़ित
न
बने,
बल्कि
राष्ट्रीय जलवायु
विमर्श
में
समानता
और
न्याय
की
सशक्त
माँग
करे।
तभी
हिमालयी विकास
टिकाऊ
होगा,
न
कि
विनाशकारी।
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